Thursday, 30 July 2026

पद (सूरदास)

कवि- सूरदास
कवि परिचय


सूरदास का जन्म सन् 1478 ई के आसपास माना जाता है।
वे दिल्ली के निकट ‘सीही’ नामक गाँव के रहनेवाले थे।
उनके गुरु का नाम महाप्रभु वल्लभाचार्य था।
वे पर्यटन, सत्संग, कृष्णभक्ति, और वैराग्य में रुचि लेते थे।
जन्म से अंधे थे अथवा बड़े होने पर दोनों आंखे जाती रही।
उनकी प्रमुख रचनाओं मे सुरसागर, साहित्यलहरी, राधारसकेलि, सुरसारावाली इत्यादि प्रमुख है।

कक्षा 12 हिन्‍दी के सम्‍पूर्ण पाठ का व्‍याख्‍या जानें।

पाठ परिचय: प्रस्‍तुत पाठ के दोनों पद सुरदास रचित ‘सूरसागार‘ से लिया गया है। इन पदों में सूर की काव्‍य और कला से संबंधित विशिष्‍ट प्रतिभा की अपूर्व झलक मिलती है। प्रथम पद में दुलार भरे कोमल-मधुर स्‍वर में सोए हुए बालक कृष्‍ण को भोर होने की सूचना देते हुए जगाया जा रहा है। द्वितीय पद में पिता नंद की गोद में बैठकर बालक श्रीकृष्‍ण को भोजन करते दिखाया गया है।

पद
( 1 )

जागिए ब्रजराज कुंवर कंवल-कुसुम फूले।
कुमुद -वृंद संकुचित भए भुंग लॅता भूले॥

प्रस्तुत पद वात्सल्य भाव के हैं और सुरसागर से संकलित है जिसमें सूरदास जी मातृ स्नेह का भाव प्रदर्शित कर रहे हैं। माता यशोदा अपने पुत्र कृष्ण को सुबह होने पर जगा रही है। वह कहती हैं कि हे ब्रज के राजकुमार! अब जाग जाओ। कमल पुष्प खिल गए हैं तथा कुमुद भी बंद हो गए हैं। (कुमुद रात्रि में ही खिलते हैं, क्योंकि इनका संबंध चंद्रमा से हैं) भ्रमर कमल-पुष्पों पर मंडाराने लगे हैं।

तमचूर खग रोर सुनह बोलत बनराई।
रांभति गो खरिकनि में, बछरा हित धाई॥

प्रस्तत पद वात्सल्य भाव के हैं और सूरसागर से संकलित है जिसमें सूरदास जी मातृ स्नेह का भाव प्रदर्शित कर रहे हैं। माता यशोदा अपने पुत्र कृष्ण को सुबह होने पर जगा रही है। वह कहती हैं कि हे ब्रज के राजकुमार! अब जाग जाओ। सवेरा होने के प्रतीक मुर्गे बांग देने लगे हैं और पक्षियों व चिड़ियों का कलरव प्रारंभ हो गया है। गोशाला में गाएं बछड़ों के लिए रंभा रही हैं।

विधु मलीन रवि प्रकास गावत नर नारी।
सूर स्याम प्रात उठौ, अंबुज-कर-धारी ।।

प्रस्तुत पद वात्सल्य भाव के हैं और सुरसागर से संकलित है जिसमें सूरदास जी मातृ स्नेह का भाव प्रदर्शित कर रहे हैं। माता यशोदा अपने पुत्र कृष्ण को सुबह होने पर जगा रही है। वह कहती हैं कि हे ब्रज के राजकुमार! अब जाग जाओ। चंद्रमा का प्रकाश मलिन हो गया है अर्थात चाँद चुप गया है तथा सूर्य निकल आया है। नरनारियां प्रात:कालीन गीत गा रहे हैं। अत: हे श्यामसुंदर! अब तुम उठ जाओ। सूरदास कहते हैं कि यशोदा बड़ी मनुहार करके श्रीगोपाल को जगा रही हैं वे कहती है हे हाथों मे कमल धारण करने वाले अब उठ जाओ ।

( 2 )
जेवत स्याम नंद की कनियाँ।
कछुक खात, कछु धरनि गिरावत, छबि निरखति नंद-रनियाँ।

प्रस्तुत पद वात्सल्य भाव के हैं और सुरसागर से संकलित है जिसमें सूरदास जी मातृ-पितृ स्नेह का भाव प्रदर्शित कर रहे हैं। श्री कृष्ण नंद की गोद में बैठकर भोजन कर रहे हैं। वे कुछ खाते हैं कुछ धरती पर गिराते हैं तथा इस मनोरम दृश्य को नंद की रानी (माँ यशोदा) देख रही है।

बरी, बरा बेसन, बहु भाँतिनि, व्यंजन बिविध, अंगनियाँ।
डारत, खात, लेत, अपनैं कर, रुचि मानत दधि दोनियाँ।

प्रस्तुत पद वात्सल्य भाव के हैं और सूरसागर से संकलित है जिसमें सूरदास जी मातृ-पितृ स्नेह का भाव प्रदर्शित कर रहे हैं। श्री कष्ण नंद की गोद में बैठकर भोजन कर रहे है । उनके खाने के लिए अनगिनत प्रकार के व्यंजन जैसे बेसन के बाड़े, बरियाँ इत्यादि बने हए है। वे अपनी हाथों से कुछ खाते हैं और कँछ गिराते हैं लेकिन उनकी रुचि केवल दही के पात्र में अत्यधिक होती है

मिस्री,दधि माखन मिस्रीत करि, मुख नावत छबि धनियाँ।
आपुन खात, नंद-मुख नावत, सो छबि कहत न बानियाँ।

प्रस्तुत पद वात्सल्य भाव के हैं और सुरसागर से संकलित है जिसमे सरदास जी मातृ-पितृ स्नेह का भाव प्रदर्शित कर रहे हैं। श्री कृष्ण नंद की गोद में बैठकर भोजन कर रहे है । उन्हे दही अधिक पसंद है। वे मिश्री, दही और मक्खन को मिलाकर अपने मुख में डालते है यह मनोरम दृश्य देखकर माँ यशोदा धन्य हो जाती है। वे खुद भी खाते हैं और कुछ नंद जी के मुंह में भी डालते हैं ये मनोरम छवि का वर्णन करते नहीं बनता।

जो रस नंद-जसोदा बिलसत, सो नहि तिहू भुवनियाँ।
भोजन करि नंद अचमन लीन्हौ, मांगत सूर जुठनियाँ।।

प्रस्तुत पद वात्सल्य भाव के हैं और सूरसागर से संकलित है जिसमें सूरदास जी मातृ-पितृ स्नेह का भाव प्रदर्शित कर रहे हैं। श्री कृष्ण नंद की गोद में बैठकर भोजन कर रहे हैं। इस दिव्य क्षण का जो आनंद नंद और यशोदा को मिल रहा है यह तीनों लोको में किसी को प्राप्त नहीं हो सकता। भोजन करने के बाद नंद और श्री कृष्ण कुल्ला करते है और सूरदास उनका जूठन मांग रहे है ।


पाठयपुस्तक

Wednesday, 29 July 2026

करबक :- मलिक मुहम्मद जायसी

कड़‍बक कविता का अर्थ | Karbak Class 12

कवि – मलिक मुहम्‍मद जायसी
कवि परिचय

जायसी निर्गुण भक्ति धारा के प्रेममार्गी शाखा के प्रमुख कवि है |
जायसी का जन्म सन् 1492 ई० के आसपास माना जाता है। वे उत्तर प्रदेश के जायस नामक स्थान के रहनेवाले थे।
उनके पिता का नाम मलिक शेख ममरेज (मलिक राजे अशरफ) था
जायसी कुरुप व काने थे।

चेचक के कारण उनका चेहरा रूपहीन हो गया था तथा बाईं आँख और कान से वंचित थे।
उनकी 21 रचनाओं के उल्लेख मिलते हैं जिसमें पद्मावत, अखरावट, आखिरी कलाम, कहरनामा, चित्ररेखा, कान्हावत आदि प्रमुख हैं।

जायसी की मृत्यु 1548 के करीब हुई।

मलिक मुहम्‍मद जायसी ‘प्रेम के पीर’ के कवि हैं।

इस पाठ में दो कड़बक प्रस्तुत किया गया है। पहला कड़बक पद्मावत के प्रारंभिक छंद तथा दूसरा कड़बक पद्मावत के अंतिम छंद से लिया गया है। प्रथम कड़बक में कवि अपने रूपहीनता  और एक आंख के अंधेपन के बारे में कहते हैं। वह रूप से अधिक अपने गुणों की ओर अपना ध्‍यान खींचते हैं।

द्वितीय कड़बक में कवि अपने काव्‍य और उसकी कथासृष्टि के बारे में हमें बताते हैं। वह कहते हैं कि मनुष्‍य मर जाता हैं पर उसकी कीर्ति सुगंध की तरह पीछे रह जाती है।

कड़बक
(1)

एक नैन कबि मुहमद गुनी | सोई बिमोहा जेइँ कबि सुनी |

भावार्थ- स्तुत पंक्तियाँ मलिक मुहम्मद जायसी द्वारा रचित महाकाव्य पद्मावत के अंश है जिसमे कवि कहते है कि एक नैन के होते हुए भी जायसी गुणी (गुणवान) है। जो भी उनकी काव्य को सुनता है वो मोहित हो जाता है 

चाँद जईस जग विधि औतारा | दीन्ह कलंक कीन्ह उजिआरा। जग सूझा एकइ नैनाहाँ।उवा सूक अस नखतन्ह माहाँ ।

भावार्थ- प्रस्तुत पंक्तियाँ मलिक मुहम्मद जायसी दवारा रचित महाकाव्य पदमावत के अंश है जिसमें कवि कहते है ईश्वर ने उन्हें चंद्रमा की तरह इस धरती पर उतारा लेकिन जैसे चंद्रमा में कमी है वैसे ही कवि मे भी फिर भी कवि चंद्रमा की तरह अपने काव्य की प्रकाश पूरे संसार में फैला रहे है।
जिस प्रकार अकेला शुक्र नक्षत्रों के बीच उदित है। उसी प्रकार कवि ने भी अपनी एक ही ऑख से इस दुनिया को भली-भांति समझ लिया है।

जौ लहि अंबहि डाभ न होई | तौ लहि सुगन्ध बसाइ न सोई।

भावार्थ- प्रस्तुत पंक्तियाँ मलिक मुहम्मद जायसी दवारा रचित महाकाव्य पदमावत के अंश है जिसमे कवि कहते है कि जबतक आम मे नुकीली डाभ (मंजरी) नहीं होती तबतक उसमे सुगंध नहीं आती।

कीन्ह समुन्द्र पानि जौ खारा | तौ अति भएउ असुझ अपारा।

भावार्थ- प्रस्तुत पंक्तियों मलिक मुहम्मद जायसी दवारा रचित महाकाव्य पदमावत के अंश है जिसमे कवि कहते है कि समुन्द्र को पनि खारा है इसलिए ही वह असूझ और अपार है।

जौ सुमेरु तिरसूल बिनासा | भा कंचनगिरि लाग अकासा।

भावार्थ- प्रस्तुत पंक्तियाँ मलिक मुहम्मद जायसी दवारा रचित महाकाव्य पदमावत के अंश है जिसमे कवि कहते है कि जबतक सुमेरु पर्वत को त्रिशूल से नष्ट नहीं किया गया तबतक वो सोने का नहीं हआ।

जौ लहि घरी कलंक न परा | कॉच होई नहिं कंचन करा।

भावार्थ- प्रस्तुत पंक्तियों मलिक मुहम्मद जायसी दवारा रचित महाकाव्य पद्मावत के अंश है जिसमे कवि कहते है कि जबतक घेरिया (सोना गलाने वाला पात्र) मे सोने को गलाया नहीं जाता तबतक वह कच्ची धातु सोना नहीं होती।

एक नैन जस दरपन औ तेहि निरमल भाउ।
सब रूपवंत गहि मुख जोवहि कइ चाउ ।।


भावार्थ- प्रस्तुत पंक्तियाँ मलिक मुहम्मद जायसी दवारा रचित महाकाव्य पदमावत के अंश है जिसमें कवि कहते है कि वे एक नैन के होते हए भी दर्पण की तरह निर्मल और स्वच्छ भाव वाले है और उनकी इसी गुण की वजह से बड़े-बड़े रूपवान लोग उनके चरण पकड़ कर कुछ पाने की इच्छा लिए उनके मुख की तरफ ताका करते हैं।

( 2 )

मुहमद कबि यह जोरि सुनावा | सुना जो पेम पीर गा पावा॥
जोरी लाइ रकत कै लेई । गाढ़ी प्रीति नयनन्ह जल भेई॥


भावार्थ- प्रस्तुत पंक्तियाँ मलिक मुहम्मद जायसी द्वारा रचित महाकाव्य पद्मावत के अंश है जिसमें कवि कहते हैं कि जिसमें कवि अपने काव्य के बारे में बताते हए कहते हैं कि मैंने (मुहम्मद) यह काव्य रचकर सुनाया है और जिसने भी इसे सुना उसे प्रेम की पीड़ा का अनुभव हुआ। मैंने इस काव्य को रक्त की लेई लगाकर जोड़ा है तथा गाढ़ी प्रीति को आँसुओं के जल मे भिंगोया है।

औ मन जानि कबित अस कीन्हा। मक यह रहै जगत महँ चीन्हा॥
कहाँ सो रतनसेन अस राजा | कहाँ सुवा असि बुधि उपराजा॥
कहाँ अलाउदीन सुलतानू । कहँ राघौ जेई कीन्ह बखानू॥
कहँ सुरूप पदुमावति रानी | कोइ न रहा, जग रही कहानी॥

भावार्थ- प्रस्तुत पंक्तियाँ मलिक मुहम्मद जायसी द्वारा रचित महाकाव्य पद्मावत के अंश हैं जिसमें कवि कहते हैं कि मैंने इसका काव्य की रचना यह जानकार की कि मेरे ना रहने के बाद इस संसार मे मेरी आखिरी निशानी यही हो । अब न वह रत्नसेन है और न वह रूपवती पद्मावती, न वह बुद्धिमान सुआ है और न राघवचेतन या अलाउद्दीन है। आज इनमें से कोई भी नहीं लेकिन यश के रूप में इनकी कहानी रह गई है।

धानि सोई जस कीरति जासू । फूल मरै, पै मरै न बासू॥

भावार्थ- प्रस्तुत पंक्तियाँ मलिक मुहम्मद जायसी द्वारा रचित महाकाव्य पद्मावत के अंश है जिसमें कवि कहते है कि वह पुरुष धन्य है जिसकी कीर्ति और प्रतिष्ठा इस संसार में है उसी तरह रह जाती है जिस प्रकार पुष्प के मुरझा जाने पर भी उसका सुगंध रह जाता है।

केइँ न जगत जस बेंचा, केइ न लीन्ह जस मोल।
जो यह पढ़ कहानी, हम सँवरै दुइ बोल॥

भावार्थ- प्रस्तुत पंक्तियाँ मलिक मुहम्मद जायसी दवारा रचित महाकाव्य पद्मावत के अंश है जिसमे कवि कहते हैं इस संसार मे यश न तो किसी ने बेचा है और न ही किसी ने खरीदा है | कवि कहते हैं कि जो मेरे कलेजे के खून से रचित कहानी को पढ़ेगा वह हमे दो शब्दों मे याद रखेगा ।  

कड़बक पाठ्य पुस्तक के प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
कवि ने अपनी एक आँख की तुलना दर्पण से क्यों की है?
उत्तर-
कवि ने अपनी एक आँख की तुलना दर्पण से इसलिए की है क्योंकि दर्पण स्वच्छ व निर्मल होता है, उसमें मनुष्य की वैसी ही प्रतिछाया दिखती है जैसा वह वास्तव में होता है। कवि स्वयं को दर्पण के समान स्वच्छ व निर्मल भावों से ओत-प्रोत मानता है। उसके हृदय में जरा-सा भी कृत्रिमता नहीं है। उसके इन निर्मल भावों के कारण ही बड़े-बड़े रूपवान लोग उसके चरण पकड़कर लालसा के साथ उसके मुख की ओर निहारते हैं।

प्रश्न 2.
पहले कड़बक में कलंक, काँच और कंचन से क्या तात्पर्य है?
उत्तर-
अपनी कविताओं में कवि जायसी ने कलंक, काँच और कंचन आदि शब्दों का प्रयोग किया है। इन शब्दों की कविता में अपनी अलग-अलग विशेषताएँ हैं। कवि ने इन शब्दों के माध्यम से अपने विचारों को अभिव्यक्ति देने का कार्य किया है।

जिस प्रकार काले धब्बे के कारण चन्द्रमा कलंकित हो गया फिर भी अपनी प्रभा से जग को आलोकित करने का काम करता है। उसकी प्रभा के आगे चन्द्रमा का काला धब्बा ओझल हो जाता है, ठीक उसी प्रकार गुणीजन की कीर्त्तियों के सामने उनके एकाध-दोष लोगों की नजरों से ओझल हो जाते हैं। कंचन शब्द के प्रयोग करने के पीछे कवि की धारणा है कि जिस प्रकार शिव-त्रिशूल द्वारा नष्ट किये जाने पर सुमेरु पर्वत सोने का हो गया ठीक उसी प्रकार सज्जनों की संगति से दुर्जन भी श्रेष्ठ मानव बन जाता है। संपर्क और संसर्ग में ही वह गुण निहित है लेकिन पात्रता भी अनिवार्य है।

यहाँ भी कवि ने गुण-कर्म की विशेषता का वर्णन किया है। ‘काँच’ शब्द की अर्थक्ता भी कवि ने अपनी कविताओं में स्पष्ट करने की चेष्टा की है। बिना घरिया में (सोना गलाने के पात्र को घरिया कहते हैं) गलाए काँच असली स्वर्ण रूप को नहीं प्राप्त कर सकता है ठीक उसी प्रकार इस संसार में किसी मानव को बिना संघर्ष, तपस्या और त्याग के श्रेष्ठमा नहीं प्राप्त हो सकती।

उपरोक्त शब्दों की चर्चा करते हुए कवि ने लोक जगत को यह बताने की चेष्टा की है कि किसी भी जन का अपने लक्ष्य शिखर पर चढ़ने के लिए जीवन रूपी घरिया में स्वयं को तपाना पड़ता है। निखारना पड़ता है। उक्त शब्दों के माध्यम से कवि के कहने का तात्पर्य यह है कि गुणी होने के लिए सतत संघर्ष और साधना की जरूरत है। यही एक माध्यम है जिसके कारण जीवन रूपी सुमेरू, चाँद या कच्चे सोने को असली रूप दिया जा सकता है। गुणवान व्यक्ति सर्वत्र और सर्वकाल में पूजनीय हैं वंदनीय हैं।


कहने का तात्पर्य है कि एक आँख से अंधे होने पर भी जायसी अपनी काव्य प्रतिभा और कृतित्व के बल पर लोक जगत में सदैव आदर पाते रहेंगे।

प्रश्न 3.
पहले कड़बक में व्यंजित जायसी के आत्मविश्वास का परिचय अपने शब्दों में दें।
उत्तर-
महाकवि मलिक मुहम्मद जायसी अपनी कुरूपता और एक आँख से अंधे होने पर शोक प्रकट नहीं करते हैं बल्कि आत्मविश्वास के साथ अपनी काव्य प्रतिभा के बल पर लोकहित की बातें करते हैं। प्राकृतिक प्रतीकों द्वारा जीवन में गुण की महत्ता की विशेषताओं का वर्णन करते हैं।

जिस प्रकार चन्द्रमा काले धब्बे के कारण कलंकित तो हो गया किन्तु अपनी प्रभायुक्त आभा से सारे जग को आलोकित करता है। अत: उसका दोष गुण के आगे ओझल हो जाता है।

जिस प्रकार बिना आम्र में मंजरियों या डाभ के नहीं आने पर सुबास नहीं पैदा होता है, चाहे सागर का खारापन उसके गुणहीनता का द्योतक है। सुमेरू-पर्वत की यश गाथा भी शिव-त्रिशूल के स्पर्श बिना निरर्थक है। घरिया में तपाए बिना सोना में निखार नहीं आता है ठीक उसी प्रकार कवि का जीवन भी नेत्रहीनता के कारण दोष-भाव उत्पन्न तो करता है किन्तु उसकी काव्य-प्रतिभा के आगे सबकुछ गौण पड़ जाता है।

कहने का तात्पर्य यह है कि कवि का नेत्र नक्षत्रों के बीच चमकते शुक्र तारा की तरह है। जिसके काव्य का श्रवण कर सभी जन मोहित हो जाते हैं। जिस प्रकार अथाह गहराई और असीम आकार के कारण समुद्र की महत्ता है। चन्द्रमा अपनी प्रभायुक्त आभा के लिए सुखदायी है। सुमेरू पर्वत शिव-त्रिशूल द्वारा आहत होकर स्वर्णमयी रूप को ग्रहण कर लिया है। आम भी डाभ का रूप पाकर सुवासित और समधुर हो गया है। घरिया में तपकर कच्चा सोना भी चमकते सोने का रूप पा लिया है।

जिस प्रकार दर्पण निर्मल और स्वच्छ होता है-जैसी जिसकी छवि होती है-वैसा ही प्रतिबिम्ब दृष्टिगत होता है। ठीक उसी प्रकार कवि का व्यक्तित्व है। कवि का हृदय स्वच्छ और निर्मल है। उसकी कुरूपता और एक आँख के अंधेपन से कोई प्रभाव नहीं पड़नेवाला। वह अपने लोक मंगलकारी काव्य-सृजनकार सारे जग को मंगलमय बना दिया है। इसी कारण रूपवान भी उसकी प्रशंसा करते हैं और शीश नवाते हैं। उपरोक्त प्रतीकों के माध्यम से कवि ने अपने आत्मविश्वास का सटीकर चित्रण अपनी कविताओं के द्वारा किया है।

प्रश्न 4.
कवि ने किस रूप में स्वयं को याद रखे जाने की इच्छा व्यक्त की है? उनकी इस इच्छा का मर्म बताएँ।
उत्तर-
कवि मलिक मुहम्मद जायसी ने अपनी स्मृति के रक्षार्थ जो इच्छा प्रकट की है, उसका वर्णन अपनी कविताओं में किया है।


कवि का कहना है कि मैंने जान-बूझकर संगीतमय काव्य की रचना की है ताकि इस प्रबंध के रूप में संसार में मेरी स्मृति बरकरार रहे। इस काव्य-कृति में वर्णित प्रगाढ़ प्रेम सर्वथा नयनों की अश्रुधारा से सिंचित है यानि कठिन विरह प्रधान काव्य है।

दूसरे शब्दों में जायसी ने उस कारण का उल्लेख किया है जिससे प्रेरित होकर उन्होंने लौकिक कथा का आध्यात्मिक विरह और कठोर सूफी साधना के सिद्धान्तों से परिपुष्ट किया है। इसका , कारण उनकी लोकैषणा है। उनकी हार्दिक इच्छा है कि संसार में उनकी मृत्यु के बाद उनकी कीत्ती नष्ट न हो। अगर वह केवल लौकिक कथा-मात्र लिखते तो उससे उनकी कार्ति चिर स्थायी नहीं होती। अपनी कीर्ति चिर स्थायी करने के लिए ही उन्होंने पद्मावती की लौकिक कथा को सूफी साधना का आध्यात्मिक पृष्ठभूमि पर प्रतिष्ठित किया है। लोकैषणा भी मनुष्य की सबसे प्रमुख वृत्ति है।

प्रश्न 5.
भाव स्पष्ट करें-जौं लहि अंबहि डांभ न होई। तौ लहि सुगंध बसाई न सोई॥
उत्तर-
प्रस्तुत पंक्तियाँ कड़बक (1) से उद्धृत की गयी है। इस कविता के रचयिता मलिक मुहम्मद जायसी हैं। इन पंक्तियों के द्वारा कवि ने अपने विचारों को प्रकट करने का काम किया है। जिस प्रकार आम में नुकीली डाभे (कोयली) नहीं निकलती तबतक उसमें सुगंध नहीं आता यानि आम में सुगन्ध आने के लिए डाभ युक्त मंजरियों का निकलना जरूरी है। डाभ के कारण आम की खुशबू बढ़ जाती है, ठीक उसी प्रकार गुण के बल पर व्यक्ति समाज में आदर पाने का हकदार बन जाता है। उसकी गुणवत्ता उसके व्यक्तित्व में निखार ला देती है।

काव्य शास्त्रीय प्रयोग की दृष्टि से यहाँ पर अत्यन्त तिरस्कृत वाक्यगत वाच्य ध्वनि है। यह ध्वनि प्रयोजनवती लक्षण का आधार लेकर खड़ी होती है। इसमें वाच्यार्थ का सर्वथा त्याग रहता है और एक दूसरा ही अर्थ निकलता है।।

इन पंक्तियों का दूसरा विशेष अर्थ है कि जबतक पुरुष में दोष नहीं होता तबतक उसमें गरिमा नहीं आती है। डाभ-मंजरी आने से पहले आम के वृक्ष में नुकीले टोंसे निकल आते हैं।
प्रश्न 6.
‘रकत कै लेई’ का क्या अर्थ है?
उत्तर-
कविवर जायसी कहते हैं कि कवि मुहम्मद ने अर्थात् मैंने यह काव्य रचकर सुनाया है। इस काव्य को जिसने भी सुना है उसी को प्रेम की पीड़ा का अनुभव हुआ है। मैंने इस कथा को रक्त रूपी लेई के द्वारा जोड़ा है और इसकी गाढ़ी प्रीति को आँसुओं से भिगोया है। यही सोचकर मैंने इस ग्रन्थ का निर्माण किया है कि जगत में कदाचित, मेरी यही निशानी शेष बची रह जाएगी।


प्रश्न 7.
महम्मद यहि कबि जोरि सनावा’-यहाँ कवि ने ‘जोरि’ शब्द का प्रयोग किस अर्थ में किया है?
उत्तर-
‘मुहम्मद यहि कबि जोरि सुनावा’ में ‘जोरि’ शब्द का प्रयोग कवि ने ‘रचकर’ अर्थ में किया है अर्थात् मैंने यह काव्य रचकर सुनाया है। कवि यह कहकर इस तथ्य को उजागर करना चाहता है कि मैंने रत्नसेन, पद्मावती आदि जिन पात्रों को लेकर अपने ग्रन्थ की रचना की है, उनका वास्तव में कोई अस्तित्व नहीं था, अपितु उनकी कहानी मात्र प्रचलित रही है।


प्रश्न 8.
दूसरे कड़बक का भाव-सौन्दर्य स्पष्ट करें।
उत्तर-
दूसरे कड़बक में कवि ने इस तथ्य को उजागर किया है कि उसने रत्नसेन, पद्मावती आदि जिन पात्रों को लेकर अपने ग्रन्थ की रचना की है उनका वास्तव में कोई अस्तित्व नहीं था, अपितु उनकी कहानी मात्र प्रचलित रही है। परन्तु इस काव्य को जिसने भी सुना है उसी को प्रेम की पीड़ा का अनुभव हुआ है। कवि ने इस कथा को रक्त-रूपी लेई के द्वारा जोड़ा है और इसकी गाढ़ी प्रीति को आँसुओं से भिगोया है। कवि ने इस काव्य की रचना इसलिए की क्योंकि जगत में उसकी यही निशानी शेष बची रह जाएगी। कवि यह चाहता है कि इस कथा को पढ़कर उसे भी याद कर लिया जाए।

प्रश्न 9.
व्याख्या करें
“धनि सो पुरुख जस कीरति जासू।
फूल मरै पै मरै न बासू ॥”
उत्तर-
प्रस्तुत पंक्तियाँ जायसी लिखित कड़बक के द्वितीय भाग से उद्धत की गयी है। उपरोक्त पंक्तियों में कवि का कहना है कि जिस प्रकार पुष्प अपने नश्वर शरीर का त्याग कर देता है किन्तु उसकी सुगन्धित धरती पर परिव्याप्त रहती है, ठीक उसी प्रकार महान व्यक्ति भी इस धाम पर अवतरित होकर अपनी कीर्ति पताका सदा के लिए इस भवन में फहरा जाते हैं। पुष्प सुगन्ध सदृश्य यशस्वी लोगों की भी कीर्तियाँ विनष्ट नहीं होती। बल्कि युग-युगान्तर उनकी लोक हितकारी भावनाएँ जन-जन के कंठ में विराजमान रहती है।

दूसरे अर्थ में पद्मावती की लौकिक कथा को आध्यात्मिक धरातल पर स्थापित करते हुए कवि ने सूफी साधना के मूल-मंत्रां को जन-जन तक पहुँचाने का कार्य किया है। इस संसार की नश्वरता की चर्चा लौकिक कथा काव्यों द्वारा प्रस्तुत कर कवि ने अलौकिक जगत से सबको रू-ब-रू कराने का काम किया है। यह जगत तो नश्वर है केवल कीर्तियाँ ही अमर रह जाती हैं। लौकिक जीवन में अमरता प्राप्ति के लिए अलौकिक कर्म द्वारा ही मानव उस सत्ता को प्राप्त कर सकता है।

Sunday, 5 July 2026

CLASS -12th ENGLISH RAINBOW PART 2 Lesson - 6

     Lesson -06 THE ARTIST  By - Shiga Naoya

                              ABOUT POET 

                                   Shiga Naoya  was a Japanese short writer and novelist  . He was also known as "God of the novel " . He was one of the greatest poet of 20th century . He was born in 20th feb 1883 . ( Oshika , District, Miyaji , Japan ) and died in 21st oct 1971 (Tokyo) . 'The Artist' unfurls before us the world of a talented Japanese boy Seibei . It shows how the adult world often causes damage to such talents .

Summary of the lesson 

The artist is a short story composed by a Japanese writer 'shiga naoya' .  this story show the old thinking of teacher and parents toward the students .  the teacher and parents thinks that spending time except study is only wasted time. 
                                    In the story Seibei  is a 12 years old Japanese boy . who was passionately interested in Guards. he is not interested in studying and playing with the students after class , he usually wondered about the town looking for Gourds ,  he would sit cross-legged in the corner of the bed and start working on new fruits , he used to walk everywhere in the search of Gourds  . but his father didn't like his son's work. he wanted his son to give up this unwanted task. 
                                      One day Seibei purchases an attractive Guards from an old women , and take it to his school after sometimes he was got red handed by his teacher . the teacher give the Guards to an old portal the old porter sold this guard to a courier dealer for 50 yen and curio- dealer sold it for 600 yen . After getting  complaint his father smashed  his all gourds .  at last by forcibly he made his to give up that work .  this way we see that the teacher and parents didn't care for the interest of the child .
Word power:- 
Sensitive - संवेनशील
Unfurls - खुलता है ।
Talent - कला , प्रतिभा
Sizeable-  बड़ा
Unpleasant - अप्रिय

Fetch - लाना
Strolling - टहलते हुए ।
Startled - चौंकते हुए ।
Unusual - असमान्य
Glimpse - झलक

Elongated - लंबा
Splendid - निष्कपट
Grocery - किराना दुकान
Curio - shop - अनोखी वस्तुओं की दुकान
Fashioned - सजा-धजा

Especially - विशेष रूप से
Damp - गीला
Adoringly - आराधनापूर्वक
Treasure - खजाना
Harbour - बंदरगाह

Recognise - पहचानना
Favoured - पसंदीदा
Polishing - चमक
Conversation - बातचीत
Stupid - मूर्ख

Anger - गुस्सा
Interrupted - बाधित
Immediately - तुरंत
Cluster - झुंड
Urgent - तत्काल

Dashed - धराशाई
Indulge - लिप्त
Trembled -काँप उठा
Responsibility - जिम्मेदारी
Muttered- बुदबुदाया

Gradually- धीरे-धीरे
Bitterness- तीखापन
Wages- भारा
Collector- जमा करने वाला
Coppers- सिक्के

Assuming- मानना
Confiscated- जब्त
Smash- तोड़ फोड़
Hammer- हथौड़ा
Attention- धयान

Belong- संबंधित
Sobbing- सिसकते हुए
Staired- सीधी
Embarrassment- शर्मिंदगी
Future- भविष्य

WORD POWER :- 

Gourds - लौकी
Sen - जापान की मुद्रा
Sake- जापान की एक पेय पदार्थ जिसे चावल से बनाया जाता है ।
Dregs - तलछट

Passionately- पूरी भावना से
Pate - खोपड़ी
Confectioner's - हलवाई
Appraising - मूल्यांकन

Gnarled- ऐंठा हुआ ।
Symmetrical- सममित
Disgusted- घृणा करना
Clumsy- बेढंगा

Persimmons- खुरमा
Incensed- नाराज़
Ethics- अचार- विचार
Effeminate-  स्त्रीवत

Raucously- कर्कशतापूर्वक
Confiscated- जब्त कर लिया 
Inconspicuous- अगोचर
Vindictive - प्रतिशोधी

Rhetoric- भाषणकला
Whine- कराहना
Grabbed- पकड़ा
Bawled-चिल्लाना
 
Porter-कुली
Yen - जापान की मुद्रा
Astounded- चकित
Astute- चालक

Adamant - अटल
Engrossed- तल्लीन

Objective question 

1. Shiga Naoya has written the story..........
(A) The Earth
(B) A Pinch of Snuff
(C) The Artist
(D) None of these
Answer ⇒ C
2. Seibei was a twelve years old…………. boy.
(A) Chinese
(B) Japanese
(C) African
(D) Indian
Answer ⇒ B
3. Seibei was a……………. Japanese boy.
(A) nine years old
(B) ten years old
(C) eleven years old
(D) twelve years old
Answer ⇒ D
4. Seibei’s hobby was collecting of .........
(A) stamps
(B) books
(C) gourds
(D) None of these
Answer ⇒ C
5. Seibei was passionately interested in.............
(A) Pumpkin
(B) gourds
(C) potato
(D) None of these
Answer ⇒ B
6. Shiga Naoya is a …………… short story writer . 
(A) Chinese
(B) Indian
(C) American
(D) Japanese
Answer ⇒ D
7. One day Seibei was caught red handed by his …  teacher.
(A) Hindi
(B) Math
(C) Ethics
(D) Hindi
Answer ⇒ C
8. Seibei bought a………… inch gourds from an old woman.
(A) four
(B) five
(C) six
(D) seven
Answer ⇒ B
9. The teacher became very-very…………with Seibei for neglecting his studies.
(A) happy
(B) sad
(C) angry
(D) friendly
Answer ⇒ C
10. Seibei reads at ………… school.
(A) High
(B) primary
(C) Middle
(D) None of these
Answer ⇒ B
11. Seibei got gourds for a few ............
(A) rupee
(B) taka
(C) sen
(D) None of these
Answer ⇒ C
12. One must admire the inharent qalities in the ...............
(A) young
(B) children
(C) old
(D) adult
Answer ⇒ B
13. The price of the five inches gourds is ...............
(A) five sen
(B) nine sen
(C) ten sen
(D) eleven sen
Answer ⇒ C
14. Seibei’s father worked at ………… shop.
(A) carpenter’s
(B) barber’s
(C) goldsmith’s
(D) None of these 
Answer ⇒ A
15. ………….. was selling dried persimmons and oranges.
(A) An old man
(B) An old woman
(C) A girl
(D) A boy
Answer ⇒ B
16. The porter sold the gourd of Seibei for..................
(A) 30
(B) 40
(C) 50
(D) 60
Answer ⇒ C
17. ………… is a short story.
(A) A marriage proposal
(B) Ideas That Have Helped Manking
(C) India Through a Traveller’s Eyes
(D) The Artist
Answer ⇒ C
18. Seibel’s hobby of collecting gourd made his teacher ..............
(A) pleased
(B) displeased
(C) laughed
(D) None of these
Answer ⇒ B
19. Seibei’s parents know that he often went out to buy himself ............
(A) oranges
(B) apples
(C) gourds
(D) potatoes
Answer ⇒ C
20. The curio-dealer sold the gourd to a wealthy collecter …...….. yen.
(A) 400
(B) 500
(C) 600
(D) 700
Answer ⇒ C
21. Seibi was passionately interested in...........
(A) baskets
(B) carrots
(C) gourds
(D) potatoes
Answer ⇒ C
22. Seibi would examine the ……… as soon as he got up.
(A) gourds
(B) painting
(C) books
(D) food
Answer ⇒ A
23. The type of gourds that appealed to Seibi was............
(A) unpolished
(B) peculiar
(C) even and symmetrical
(D) old and gnarled
Answer = (c)

P.no -50 
B.1.1. Complete the following sentences on the basis of the story:
1. Seibei was passionately interested in...................   - Gourds
2. Seibei  laughed all the way home because .……............ - realising his mistake 
3. Seibei was  .............. Old and at  ......... School .        - 12 year , primary 
4. Seibei did not appreciate baken gourd because ................. - it had not real beauty
5. Seibei was now .................. In his pictures . - engrossed


B.1.2  Answer the following questions briefly .
1. Where did seibei live ? 
Answer- Seibei lived in a harbour town .
2. Which type of Gourd did Seibei like ?
Answer- Seibei likes even and symmetrical guards .
3. Why did the conversation of his father and his friend make Seibei laugh inwardly ? 
Answer :- The conversation of his father and his friend made Seibei laugh inwardly , because his father commented on bakin gourd that they had at the agriculture show last spring. the baking guard had made quite a stir at the time, but when he (Seibei) had gone to see it he had found it rather a stupid looking object and had walked out of the show. 
4. Why did Seibei's  father shout at him ?
Answer :-Seibei's father and his friend were talking about bakin gourd , Which they had seen in the agricultural show held in the last spring , which according to him was most beautiful but Seibei found it  stupid- looking .  so seibei said that he did not think so much of it,  because it was just an awkward thing Seibei's interruption made his father angry. so he shouted at him.
5. Why did Seibei wander about the town ? 
Answer :- Seibei wander about the town in search of gourds. 

P.no - 52 
B.2.1. Complete the following sentences on the basis of the story : 
1. The old women asked .............. for the gourd.  - 10 sen
2. The teacher was particularly angry because ............... - it happened to take place in an ethics class 
3. Seibei's  father worked at ............. - Carpenter's shop 
4. Seibei's  father fetched his hammer and .................  - Smashed all gourds 
5. The courier dealer sold the confiscated gourd to ..............  - Wealthy collector

B.2.2 Answer the following questions briefly : 

1. What made Seibei's heart beat faster ? 
Answer - Seibei was examining the Gourds suddenly he caught sight of one which was 5 inches long . something about it made Seibei's heart beat faster . 
2.  which is called effeminate passtime in the story ? 
Answer - The teacher came from another part of Japan and found it most offensive that children should indulge in  such womanish pastimes as collecting Guards.  as such it is called effiminate passtime in the story. 
3. How  did Seibei's father react to the teachers complaint ? 
Answer - Seibei's father reacted to the teachers complaint when he knew . Seibei's fault which was reported by Seibei's teacher . he became angry at this matter as soon as he heard,  he grabbed his son by the caller and gave him a sound beating. he chided his son that he could never get anywhere in the world, the way he is caring on. 
4. How much did the curio dealer pay for the confiscated guard ?  
Answer - The curio-dealer paid 50 yen for the confiscated gourd . 
5. What did Seibei do after he was forced to give up collecting guards ? 
Answer - Now he is engrossed in his pictures . 




पद (सूरदास)

कवि- सूरदास कवि परिचय सूरदास का जन्म सन् 1478 ई के आसपास माना जाता है। वे दिल्ली के निकट  ‘सीही’  नामक गाँव के रहनेवाले थे। उनके...